Friday, 2 August 2019

15 अगस्त को इस वीर सपूत के बारे में जरूर लोगों को बताना l



     वीर उद्धम सिंह के वीर गाथा 

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जेलर ने पूछा, "कोई अंतिम इक्षा", उधम सिंह बोले, मेरे साँसे इसी लिए बचे हुए थे "डायर को मार अंतिम इक्षा हुई पूरी, अब फांसी दे दो"इसी


आज जिस बलिदानी का बलिदान दिवस है उस वीर के महानतम कार्य उस गाने को गाली के समान सिद्ध करते हैं जो कईयों को बचपन से रटाया जाता है .. जिस गाने में आज़ादी का हकदार बिना खड्ग बिना ढाल को बता कर केवल सूत , कपास को ही मान लिया गया .. उधम सिंह जी थे वो पराक्रमी जिनके शौर्य और गौरव को छिपाने के लिए ही सोची समझी रणनीति बना कर पिछली सरकारें केवल कुछ ख़ास नामों पर ही लाखों रुपये बहाती है, लेकिन कभी भी देश के सच्चे सपूतों को याद नहीं करती..

पिछले वर्ष आर टी आई से पता चला कि सैकड़ों करोड़ रुपये केवल कुछ गिने चुने नामों की जयंती पर ही फूंके गये थे, जबकि सच्चे क्रन्तिकारी रानी लक्ष्मी बाई से लेकर सुभाष चन्द्र बोस तक किसी को भी आज तक याद नहीं किया गया, आइये हम परम बलिदानी उधम सिंह के शौर्य को नमन व स्मरण करते है.....वही वीर जिन्होंने भारत माता के अपमान का बदला लेने के लिए अपनी संकल्प की अग्नि को २० साल तक दबाये रखा और....जलियावाला कांड का बदला लिया....ऐसे ही पंजाब के वीर उधम सिंह को आज उनके बलिदान दिवस पर हम नमन करते है...

पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में 26 दिसंबर 1899 में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा किए गए कत्लेआम का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने गोरों की मांद में घुसकर 21 साल बाद पूरा कर दिखाया। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांति के साथ सभा कर रहे सैकड़ों भारतीयों को 13 अप्रैल 1919 को अंधाधुंध फायरिंग करा मौत के घाट उतार दिया था। क्रांतिकारियों पर कई पुस्तकें लिख चुके जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल के अनुसार जलियांवाला बाग की इस घटना ने ऊधम सिंह ने इस कुकृत घटना को इतना गंभीरता से लिया कि उन्होने प्रतिज्ञा की कि मैं किसी भी स्थिति में डायर को मौत के घाट उतार दूंगा

उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका, की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।
उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। लेकिन अब तक  किताबो  हमे नहीं पढ़ाया जाता है सभी माँ भारती के सपूतों को  इस वीर  सपूत के  असहज  कहानी प्रत्येक बच्चे बच्चे को को   अवश्य बताए तभी बच्चे इस महान व्यक्तित्व का  अपने आप में धारण कर भारत   माता की सेवा हृदय से  करे l
उद्धम सिंह अमर रहे 
जय हिंद



    

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